सम्बोधन आप ......खुद लिख लेना.......
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माँ षारदा के परम पावन, ज्ञान मन्दिर से एक ज्योत जलती है जो सम्पूर्ण समाज को प्रकाष देती है। उस प्रकाष की किरण को हृदय में अवषोशित करके विद्यार्थियों को परोसने का उत्तम सेवा कार्य करने वाले..................................................................... आज हमसें विदा हो रहे है।...... आदरणीय...... गुरुजी के बारें में मैं षब्दों से क्या कहूँ....मुझे तो इनका सान्निध्य मिला है वो मेरे लिए गौरव की बात है। वैसे तो मैं काव्य धारा से नहीं हूँ फिर भी इनके सान्निध्य को, इनसे साथ गुजारे हुए वक्त को परोसने की हिम्मत कर रहा हूँ....
कि स्नेह के बंधन में बंध कर गुजर गया कुछ काल। प्रभु कृपा से खुषियाँ छायी रही चंहु और...
प्रारब्ध वष हुआ बिछोह फिर....करते है विदा आपको निज गन्तव्य की और....
है समय नदी की धारा, जिसमें सब बह जाया करते हैं।
है समय बड़ा तूफान , प्रबल पर्वत झुक जाया करते हैं।
अक्सर दुनियां के लोग समय में, चक्कर खाया करते है।
लेकिन आप जैसे गुरुजन ऐसे होते है, जो हमेषा याद आया करते है।
मुझे मालूम है आप आज मुझे ध्यान सुन रहे है... क्यों कि आज हमारा दिन है...
मैंने आपमें बहुत कुछ ऐसा देखा है जो सामान्य षिक्षक से बहुत ही विलक्षण है। इसलिए अपने विचारों को नितन्तरता देते हुए कहूँगा कि
आपके सम्बोधन में केवल जीभ ही नहीं... भावना बोलती है।
आपके चिन्तन में केवल बुद्धि ही नहीं, चेतना बोलती हैं।
हृदय से निकलने वाली आवाज ही, छूती है हृदय को।
आपके षिक्षण और नेतृत्व में किताबें ही नहीं, साधना बोलती है।
अब आप जा रहे हो....तो आप की भरपाई हो नहीं पायेगी।
आप हर बात बहुत दिनों तक रह-रह कर याद आयेगी।
मेरी दिल्लोंतम्मना है कि जब-जब भी आपका मन करे
आप इस षाला परिवार के बाहर से गुजरे...तो आप अवष्य हमारा मार्गदर्षन करने जरुर आ जाना।
आपकी प्रतिक्षा में यह षाला परिवार हर क्षण इस दरवाजे को जरुर निहारेगा।
मैं मनौवेज्ञानिक तो नहीं हूँ परन्तु आज आपके चेहरे को पढ़ने की कोषिष करता हुआ कहना चाह रहा हूँ कि...आप यही सोच रहे होगें कि
चल मुसाफिर चल यादों के इस सफर से दूर....वक्त विदा का ऐसा आया आप हम दोनों है मजबूर।
कभी हंसते थे कभी गंभीर थे, वक्त गुजरता गया। आज पता नहीं चल रहा है किसका कितना कसूर।
मन की आँखे भर आयी है, ये विदाई की वेला क्यों आयी है?
क्यों आप हमसे विदा हो रहे है?, क्यों ये महफिल सजाई है?
गुरुजी अपने आप को सभालते हुए इतना ही कहूँगा की ...
प्रकाष वहीं कर सकता है... जो जल सकता है।
विकास वहीं कर सकता है, जो खुद को बदल सकता है।
आदर्षो की बातें बघारने वालों की कमी नहीं।
मंजिल वहीं पा सकता है जो चल सकता है।
मैं इस अमुल्य वेला का, यादगार वेला का ज्यादा समय नहीं लेते हुए इतना ही कहकर अपनी वाणी को विराम देता हूँ कि
आप जैसे समर्पित महापुरुश इस षिक्षा विभाग में कभी-कभार ही आते है।
जो अपने कर्म से हमारें दिलों की गहराईयों में बस जाते हैं।
गलतियाँ लाख हुई होगी हमसें उन्हे माफ कर देना।
चुभने जैसा कांटा हो तो, जलाकर राख कर देना।
बस! इतना ही ..... आपका अपना कैलाष....
मां षारदे वरदान दे.... मुझको निज कल्याण दे।
इस दुनियां में ना किसी का ठिकाना....ना किसी का मुकाम...
विदाई की वेला को प्रारम्भ करता हूँ.... सभी को सलाम और प्रेम से राम-राम।
जो आज मिला मुझे अवसर इस मंच को गति देने उसी कड़ी में मैं इस षाला परिवार की छात्राओं को आंमत्रित करता हूँ कि वे आये और सरस्वती वन्दना से इस वेला को गति दे।
मिलन जरुरी है तो विदाई हमारी मजबूरी है। आपसे बाहर से दूरी है पर दिल से नहीं।
बस! कुछ ऐसे ही भावों को लेकर आ रहे हमारें.............. आपके समक्ष........
लगाया जो रंग लगन का आप छूटने न देना, ये स्नेह का धागा टूटने न देना।
हर कदम पर आपका अहसास हो, हर कदम पर आप साथ हो...आप अपने आप को हमसे रुठने न देना। इसी कड़ी में मैं आमंत्रित करता हूँ..........
अटा की बात वटे करबू जिने आवे कोनी...... अस्यों कुण है जो याने छावे कोनी।
सबने ये सार बात ही केवे है, ये अतरा मस्त है कि कीन्ही धपावे कोनी। बाणु मुं हेला पाड्रियूं आपणा भच बैठड़ा गुरुजी ने............................... आओ सा और इस भिदाई ने यादगार भणावों सा.....
एक षिक्षक का उपकार भला समाज क्या जाने?
षिक्षा से ही है विकसित होता हैे समाज , दुनियां ये राज क्या जाने?
बहुत धीरज रखना पड़ता है...... क ख से लेकर ज्ञ से ज्ञानी बनाने तक
इस बात को कोई उपर उड़ता हुआ मनचला बाज क्या जाने।
इसी कड़ी में मैं आमंत्रित करता हूँ...................
हम अबोध क्या जाने आप के ख्यालों को.....
आप जैसे मिला करते है..... बड़ी किस्मत वालों को.....
हम तो मंच के कच्चें सिपाही.....
आप बस! हमारें भावो का पढ़ना....खुल्ले रखना दिल के तालों को।......
तो निवेदन करता हूँ कि ......आप आये और आदरणीय गुरुजी के कर कमलों में षब्द पुश्प् अर्पित करें।
मन के झरोखे से देखु किसकी और.....
जिस-जिस को भी देख रहा हूँ... बड़ा उदास नजर आ रहा हैं।
समझ सकता हूँ आपके मन को.... विदा का अहसास नजर आ रहा है।
इसी अहसास को....जातने बताने समझाने के लिए मैं आमंत्रित करता हूँ।
मंगल पर पहँूच गये है हम, मंगल वेला आ गई है।
हंसती हंसाती इस महफिल में, उदासी छा गई है।
आओं इस उदासी के पीछे छूपे अपनें भावों को
आपके के सान्निध्य में एक दूसरें को बतायें।
दिल की भाशा, दिमाग के समझ में कभी आ नहीं सकती।
दिमाग की उड़ान से दिल की सच्चाई मैला हो नहीं सकती।
उपर की परिस्थियां है, ये बिछडने की बातें....
बाकी आपसे हमारी कभी विदाई वेला हो सकती ।
इन्ही भावों को सजाग करने मैं ....
अतः में मैं इतना ही कहँूगा कि.....
आपके द्वारा सजाये गये इस गुलषन को इस षाला परिवार को खिलाते रहने की जिम्मेदारी अब हमस ब पर आ चुकी है। अब आपके आषीर्वाद से हमें अपने कंधो को मजबूत करना होगा। आप के बतायें समझाये अनुभवों को हमें अपना अनुभव बनाना होगा। आपको हमारी जरुरत हो ना हो हमें आपकी जरुरत सदा रहेगी। क्यों कि अनुभव से निकली वाणी और अंगारो पर सिकने वालें कभी कच्चें नहीं होते है..... आप अपने आप को अपने परिवार को....अपने समाज को.... और अपने आपको जीवन के अन्तिम क्षण तक भी थकने मत देना....आप ऐसा कभी मत सोचना कि आप सेवानिवृत हो गये है....वरन् ऐसा सोचना कि आपकी सेवा अब प्रारम्भ हो रही है.... कुछ सालों बाद हमारें जीवन में भी ये पल आने वाला है...... हम सभी आपके भावी जीवन के लिए आर्त भाव से मंगलमय की कामना करते है।
इति कहूँगा नहीं.......क्यों कि इति कभी किसी भी वेला की नहीं होती है.....बस! चुपचाप अपने आप आप समझ जाना कि ......ये जीवन है इसमें बदलाव जरुर आता है......मिलन भी है तो विदाई भी....
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माँ षारदा के परम पावन, ज्ञान मन्दिर से एक ज्योत जलती है जो सम्पूर्ण समाज को प्रकाष देती है। उस प्रकाष की किरण को हृदय में अवषोशित करके विद्यार्थियों को परोसने का उत्तम सेवा कार्य करने वाले..................................................................... आज हमसें विदा हो रहे है।...... आदरणीय...... गुरुजी के बारें में मैं षब्दों से क्या कहूँ....मुझे तो इनका सान्निध्य मिला है वो मेरे लिए गौरव की बात है। वैसे तो मैं काव्य धारा से नहीं हूँ फिर भी इनके सान्निध्य को, इनसे साथ गुजारे हुए वक्त को परोसने की हिम्मत कर रहा हूँ....
कि स्नेह के बंधन में बंध कर गुजर गया कुछ काल। प्रभु कृपा से खुषियाँ छायी रही चंहु और...
प्रारब्ध वष हुआ बिछोह फिर....करते है विदा आपको निज गन्तव्य की और....
है समय नदी की धारा, जिसमें सब बह जाया करते हैं।
है समय बड़ा तूफान , प्रबल पर्वत झुक जाया करते हैं।
अक्सर दुनियां के लोग समय में, चक्कर खाया करते है।
लेकिन आप जैसे गुरुजन ऐसे होते है, जो हमेषा याद आया करते है।
मुझे मालूम है आप आज मुझे ध्यान सुन रहे है... क्यों कि आज हमारा दिन है...
मैंने आपमें बहुत कुछ ऐसा देखा है जो सामान्य षिक्षक से बहुत ही विलक्षण है। इसलिए अपने विचारों को नितन्तरता देते हुए कहूँगा कि
आपके सम्बोधन में केवल जीभ ही नहीं... भावना बोलती है।
आपके चिन्तन में केवल बुद्धि ही नहीं, चेतना बोलती हैं।
हृदय से निकलने वाली आवाज ही, छूती है हृदय को।
आपके षिक्षण और नेतृत्व में किताबें ही नहीं, साधना बोलती है।
अब आप जा रहे हो....तो आप की भरपाई हो नहीं पायेगी।
आप हर बात बहुत दिनों तक रह-रह कर याद आयेगी।
मेरी दिल्लोंतम्मना है कि जब-जब भी आपका मन करे
आप इस षाला परिवार के बाहर से गुजरे...तो आप अवष्य हमारा मार्गदर्षन करने जरुर आ जाना।
आपकी प्रतिक्षा में यह षाला परिवार हर क्षण इस दरवाजे को जरुर निहारेगा।
मैं मनौवेज्ञानिक तो नहीं हूँ परन्तु आज आपके चेहरे को पढ़ने की कोषिष करता हुआ कहना चाह रहा हूँ कि...आप यही सोच रहे होगें कि
चल मुसाफिर चल यादों के इस सफर से दूर....वक्त विदा का ऐसा आया आप हम दोनों है मजबूर।
कभी हंसते थे कभी गंभीर थे, वक्त गुजरता गया। आज पता नहीं चल रहा है किसका कितना कसूर।
मन की आँखे भर आयी है, ये विदाई की वेला क्यों आयी है?
क्यों आप हमसे विदा हो रहे है?, क्यों ये महफिल सजाई है?
गुरुजी अपने आप को सभालते हुए इतना ही कहूँगा की ...
प्रकाष वहीं कर सकता है... जो जल सकता है।
विकास वहीं कर सकता है, जो खुद को बदल सकता है।
आदर्षो की बातें बघारने वालों की कमी नहीं।
मंजिल वहीं पा सकता है जो चल सकता है।
मैं इस अमुल्य वेला का, यादगार वेला का ज्यादा समय नहीं लेते हुए इतना ही कहकर अपनी वाणी को विराम देता हूँ कि
आप जैसे समर्पित महापुरुश इस षिक्षा विभाग में कभी-कभार ही आते है।
जो अपने कर्म से हमारें दिलों की गहराईयों में बस जाते हैं।
गलतियाँ लाख हुई होगी हमसें उन्हे माफ कर देना।
चुभने जैसा कांटा हो तो, जलाकर राख कर देना।
बस! इतना ही ..... आपका अपना कैलाष....
मां षारदे वरदान दे.... मुझको निज कल्याण दे।
इस दुनियां में ना किसी का ठिकाना....ना किसी का मुकाम...
विदाई की वेला को प्रारम्भ करता हूँ.... सभी को सलाम और प्रेम से राम-राम।
जो आज मिला मुझे अवसर इस मंच को गति देने उसी कड़ी में मैं इस षाला परिवार की छात्राओं को आंमत्रित करता हूँ कि वे आये और सरस्वती वन्दना से इस वेला को गति दे।
मिलन जरुरी है तो विदाई हमारी मजबूरी है। आपसे बाहर से दूरी है पर दिल से नहीं।
बस! कुछ ऐसे ही भावों को लेकर आ रहे हमारें.............. आपके समक्ष........
लगाया जो रंग लगन का आप छूटने न देना, ये स्नेह का धागा टूटने न देना।
हर कदम पर आपका अहसास हो, हर कदम पर आप साथ हो...आप अपने आप को हमसे रुठने न देना। इसी कड़ी में मैं आमंत्रित करता हूँ..........
अटा की बात वटे करबू जिने आवे कोनी...... अस्यों कुण है जो याने छावे कोनी।
सबने ये सार बात ही केवे है, ये अतरा मस्त है कि कीन्ही धपावे कोनी। बाणु मुं हेला पाड्रियूं आपणा भच बैठड़ा गुरुजी ने............................... आओ सा और इस भिदाई ने यादगार भणावों सा.....
एक षिक्षक का उपकार भला समाज क्या जाने?
षिक्षा से ही है विकसित होता हैे समाज , दुनियां ये राज क्या जाने?
बहुत धीरज रखना पड़ता है...... क ख से लेकर ज्ञ से ज्ञानी बनाने तक
इस बात को कोई उपर उड़ता हुआ मनचला बाज क्या जाने।
इसी कड़ी में मैं आमंत्रित करता हूँ...................
हम अबोध क्या जाने आप के ख्यालों को.....
आप जैसे मिला करते है..... बड़ी किस्मत वालों को.....
हम तो मंच के कच्चें सिपाही.....
आप बस! हमारें भावो का पढ़ना....खुल्ले रखना दिल के तालों को।......
तो निवेदन करता हूँ कि ......आप आये और आदरणीय गुरुजी के कर कमलों में षब्द पुश्प् अर्पित करें।
मन के झरोखे से देखु किसकी और.....
जिस-जिस को भी देख रहा हूँ... बड़ा उदास नजर आ रहा हैं।
समझ सकता हूँ आपके मन को.... विदा का अहसास नजर आ रहा है।
इसी अहसास को....जातने बताने समझाने के लिए मैं आमंत्रित करता हूँ।
मंगल पर पहँूच गये है हम, मंगल वेला आ गई है।
हंसती हंसाती इस महफिल में, उदासी छा गई है।
आओं इस उदासी के पीछे छूपे अपनें भावों को
आपके के सान्निध्य में एक दूसरें को बतायें।
दिल की भाशा, दिमाग के समझ में कभी आ नहीं सकती।
दिमाग की उड़ान से दिल की सच्चाई मैला हो नहीं सकती।
उपर की परिस्थियां है, ये बिछडने की बातें....
बाकी आपसे हमारी कभी विदाई वेला हो सकती ।
इन्ही भावों को सजाग करने मैं ....
अतः में मैं इतना ही कहँूगा कि.....
आपके द्वारा सजाये गये इस गुलषन को इस षाला परिवार को खिलाते रहने की जिम्मेदारी अब हमस ब पर आ चुकी है। अब आपके आषीर्वाद से हमें अपने कंधो को मजबूत करना होगा। आप के बतायें समझाये अनुभवों को हमें अपना अनुभव बनाना होगा। आपको हमारी जरुरत हो ना हो हमें आपकी जरुरत सदा रहेगी। क्यों कि अनुभव से निकली वाणी और अंगारो पर सिकने वालें कभी कच्चें नहीं होते है..... आप अपने आप को अपने परिवार को....अपने समाज को.... और अपने आपको जीवन के अन्तिम क्षण तक भी थकने मत देना....आप ऐसा कभी मत सोचना कि आप सेवानिवृत हो गये है....वरन् ऐसा सोचना कि आपकी सेवा अब प्रारम्भ हो रही है.... कुछ सालों बाद हमारें जीवन में भी ये पल आने वाला है...... हम सभी आपके भावी जीवन के लिए आर्त भाव से मंगलमय की कामना करते है।
इति कहूँगा नहीं.......क्यों कि इति कभी किसी भी वेला की नहीं होती है.....बस! चुपचाप अपने आप आप समझ जाना कि ......ये जीवन है इसमें बदलाव जरुर आता है......मिलन भी है तो विदाई भी....
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